18 मार्च 1999 की रात बिहार के सेनारी गांव में ऐसा खूनखराबा हुआ जिसने पूरे राज्य को दहला दिया। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) के करीब 100 से ज्यादा हथियारबंद उग्रवादी गांव में घुसे और घर-घर जाकर पुरुषों को घसीटकर बाहर निकाला। बिजली काट दी गई और लोगों को अंधेरे में मंदिर के पास ले जाया गया और 34 भूमिहार पुरुषों का गला धारदार हथियारों से रेतकर हत्या कर दी गई। हत्या की बर्बरता इतनी भयावह थी कि अगले दिन शवों की पहचान करना भी मुश्किल हो गया। गांव की महिलाओं के साथ बदसलूकी की रिपोर्टें भी सामने आईं थीं रातों-रात सेनारी ‘विधवाओं का गांव’ बन गया। यह हत्याकांड बिहार में 90 के दशक के जातीय संघर्ष MCC और रणवीर सेना की टकराहट का सबसे खौफनाक अध्याय बनकर उभरा।

भूमिहारों को ‘विपक्षी पक्ष’ मानकर गांव को निशाना बनाया गया था कई परिवारों में दो-दो, तीन-तीन सदस्य मारे गए, बच्चे अनाथ हो गए और गांव गहरे सदमे में चला गया था नरसंहार के बाद जांच और कानूनी लड़ाई सालों तक चलती रही। 2016 में विशेष अदालत ने कई आरोपियों को फांसी और उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन 2021 में पटना हाई कोर्ट ने साक्ष्यों की कमी के आधार पर 13 आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले से पीड़ित परिवारों में भारी निराशा फैली। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।घटना के बाद राजनीति भी गरमा गई थी। उस वक्त की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का कथित बयान—वे हमारे वोटर नहीं हैं, मैं वहां क्यों जाऊं आज तक इस नरसंहार के साथ जुड़ा हुआ है और पीड़ित परिवार इसे अपनी सबसे बड़ी पीड़ा बताते हैं। 25 साल बाद भी सेनारी गांव में जख्म भरे नहीं हैं। बुनियादी सुविधाओं की कमी, पलायन, टूटी सड़कें, और न्याय का इंतजार—गांव आज भी उस रात की चीखें याद करता है।
