पाकिस्तान की मौजूदा सरकार ने देश को 12 हिस्सों में बांटने की योजना तैयार कर ली है इस योजना के तहत वर्तमान चार प्रांत—पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा—को 12 छोटे प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया जाएगा सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य प्रशासनिक सुधार, बेहतर शासन और स्थानीय जनता तक योजनाओं की तेज़ और प्रभावी पहुँच सुनिश्चित करना है हालांकि, इस प्रस्ताव पर राजनीतिक और सामाजिक विवाद तेज़ हो गया है Pakistan Peoples Party (PPP) ने इस योजना का कड़ा विरोध किया है और कहा कि सिंध प्रांत को कोई भी बाँटने का हकदार नहीं है इस विवाद में प्रमुख भूमिका Pakistan Peoples Party (PPP) की है

पार्टी के नेताओं ने कहा है कि सिंध को कोई नहीं बाँट सकता, सिर्फ अल्लाह इसका मालिक है वहीं, सरकार के नेताओं ने इस प्रस्ताव का बचाव करते हुए कहा कि यह योजना देश के सभी नागरिकों के लिए समान प्रशासनिक सुविधाएं और विकास सुनिश्चित करेगी अन्य राजनीतिक दल और विशेषज्ञ भी इस मुद्दे पर अपने-अपने मत रख रहे हैं कुछ का मानना है कि छोटे प्रांत बनाने से प्रशासनिक कार्यकुशलता बढ़ेगी, जबकि अन्य का कहना है कि इससे सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती हैयह विवाद मुख्य रूप से सिंध प्रांत और इस्लामाबाद में उभरकर सामने आया है कराची, और थार जैसी प्रमुख जगहों में राजनीतिक बयानबाज़ी और विरोध प्रदर्शन हुए हैं पाकिस्तान के नेताओं ने सिंध की जमीन और संस्कृति की रक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाया हैसरकारी स्तर पर इस प्रस्ताव की चर्चा और तैयारी 2025 के अंत में तेज हुई है हाल ही में PPP ने इस प्रस्ताव पर विरोध जताते हुए मीडिया में बयान जारी किए हैं आने वाले दिनों में सरकार इस योजना को संसद में पेश कर सकती है

छोटे प्रांत बनाने से प्रशासनिक सुधार में मदद मिलेगी, विकास योजनाओं की गति बढ़ेगी और जनता तक सेवाओं की पहुंच तेज होगीवहीं, PPP और अन्य विरोधियों का कहना है कि इससे सिंध की सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक सत्ता में असंतुलन पैदा हो सकता है देश में ऐसे संवेदनशील मुद्दों को धर्म और संस्कृति की भावना के साथ संभालना चाहिए सरकार की यह योजना को लागू करने के लिए संवैधानिक संशोधन और प्रशासनिक कानूनों में बदलाव की तैयारी कर रही हैnप्रस्तावित योजना वर्तमान में चार प्रांतों को 12 छोटे प्रांतों में बांटा जाएगा इसके लिए स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों का पुनर्गठन, सीमाओं का निर्धारण और संसदीय मंजूरी जरूरी होगी इस प्रक्रिया में यदि सभी राजनीतिक दलों और जनता की सहमति शामिल नहीं हुई तो यह देश में राजनीतिक तनाव और सामाजिक अस्थिरता बढ़ा सकती है
