अमेरिका में ग्रीनलैंड को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है अमेरिकी संसद में एक ऐसा बिल पेश किया गया है, जिसके तहत ग्रीनलैंड पर कब्जा करने और उसे अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का अधिकार सरकार को मिल सकता है यह प्रस्ताव सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है, क्योंकि ग्रीनलैंड बीते करीब 300 वर्षों से डेनमार्क का हिस्सा रहा है और उसकी संप्रभुता को लेकर पहले भी विवाद होते रहे हैंप्रस्तावित बिल के मुताबिक, अमेरिका को ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने के लिए कानूनी और प्रशासनिक रास्ता दिया जाएगा इसमें यह तर्क दिया गया है कि ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती रूस और चीन की गतिविधियों को देखते हुए अमेरिका इसे रणनीतिक रूप से जरूरी कदम बता रहा हैग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और यह प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर माना जाता है यहां दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और अन्य बहुमूल्य संसाधनों की मौजूदगी की संभावना जताई जाती है

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जिससे इस इलाके का सामरिक महत्व और बढ़ गया हैडेनमार्क के लिए यह बिल बड़ा झटका माना जा रहा है कोपेनहेगन पहले भी साफ कर चुका है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है और वह डेनमार्क का अभिन्न हिस्सा है ग्रीनलैंड को हालांकि सीमित स्वायत्तता हासिल है और वहां की स्थानीय सरकार कई आंतरिक मामलों में स्वतंत्र फैसले लेती है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति अब भी डेनमार्क के अधीन हैग्रीनलैंड की स्थानीय राजनीति में भी इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद नजर आ रहे हैं कुछ राजनीतिक समूह अधिक आर्थिक सहायता और निवेश की उम्मीद में अमेरिका से करीबी के पक्ष में दिखते हैं, जबकि कई नेता इसे ग्रीनलैंड की पहचान और स्वायत्तता के लिए खतरा मान रहे हैं स्थानीय नागरिकों के बीच भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है अमेरिका में इस बिल को लेकर भी एकमत नहीं है कुछ सांसद इसे आक्रामक और अव्यावहारिक कदम बता रहे हैं, जबकि समर्थकों का कहना है कि यह अमेरिका के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से जुड़ा मामला है

उनका तर्क है कि अगर अमेरिका अभी सक्रिय नहीं हुआ, तो आर्कटिक क्षेत्र में दूसरी महाशक्तियां अपना प्रभाव बढ़ा सकती हैं यह बिल केवल ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्कटिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन की लड़ाई को दर्शाता है रूस पहले ही आर्कटिक में अपने सैन्य ठिकानों को मजबूत कर चुका है, जबकि चीन खुद को नियर-आर्कटिक स्टेट बताकर इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिका की दिलचस्पी को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा हैअंतरराष्ट्रीय कानून के लिहाज से भी यह मामला बेहद जटिल है

किसी क्षेत्र को जबरन अपने देश में शामिल करना संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ माना जाता है ऐसे में अगर यह बिल आगे बढ़ता है, तो अमेरिका को कूटनीतिक मोर्चे पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ सकता है फिलहाल यह बिल शुरुआती चरण में है और इसे कानून बनने के लिए लंबा रास्ता तय करना होगा। हालांकि, इतना तय है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की मंशा एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है
