बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। बिहार में RJD हार के बाद कांग्रेस अब राज्य में अपने भविष्य को लेकर नए सिरे से रणनीति बना रही है। इस रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा है RJD से गठबंधन तोड़ने पर फैसला सोच रहे पार्टी के भीतर इन दिनों जिस तरह की चर्चाएँ हैं की कांग्रेस बिहार में अपनी अलग पहचान, अपना पुराना जनाधार और अपना जातीय समीकरण दोबारा से मजबूत करना चाहती है।दिल्ली हार के बाद नया नया फैसला :-दिल्ली चुनाव के नतीजों का असर अब सीधे बिहार की राजनीति में देखने को मिल रहा है।

कांग्रेस को मिली निराशाजनक हार ने पार्टी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वह गठबंधन राजनीति में खोती जा रही है या अपनी पहचान को फिर से हासिल कर सकती है। यह चर्चा लगातार हो रही है कि महागठबंधन की लाइन पर चलते-चलते कांग्रेस की अलग राजनीतिक छवि धूमिल हुई है।कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि बिहार में RJD के साथ गठबंधन रहने से पार्टी को वह राजनीतिक स्पेस नहीं मिलता जिसकी उसे जरूरत है। महागठबंधन की बैठकों सीट वितरण, चुनाव प्रचार और मुद्दों की प्राथमिकता में RJD का वर्चस्व अधिक दिखता है,

जबकि कांग्रेस पीछे रह जाती है।2025 विधानसभा चुनावों में महागठबंधन को मिली हार ने इस असंतोष को और बढ़ा दिया है कांग्रेस की अंदरूनी समीक्षाओं में यह बात सामने आई कि कई सीटों पर चुनावी लड़ाई RJD की छवि के कारण भी प्रभावित हुई है ऐसे में पार्टी अब सीधे-सीधे अपने स्वतंत्र राजनीतिक मॉडल पर लौटने की तैयारी में है।बिहार की सामाजिक संरचना हमेशा से जातीय आधार पर राजनीतिक रूप से सक्रिय रही है। कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक लंबे समय तक इन जातियों में केंद्रित रहा है मुसलमान
दलित
ब्राह्मण
भूमिहार
और सवर्ण वर्ग का एक हिस्सा

लेकिन गठबंधन राजनीति के कारण ये समुदाय धीरे-धीरे अलग-अलग दलों में बंटते चले गए है दिल्ली की हार ने कांग्रेस को यह संदेश दिया है है कि पार्टी अब सिर्फ गठबंधन पर ही निर्भर रहकर नहीं चल सकती बड़े नेता यह भी मानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि और मजबूती तभी लौटेगी, जब राज्य स्तर पर भी संगठन मजबूत होगेइसी वजह से बिहार में गठबंधन की समीक्षा की प्रक्रिया बेहद तेज हो गई है बिहार में RJD के साथ उसका गठबंधन अब घेरे में है। हाईकमान तक पहुंची रिपोर्टों में साफ कहा गया है कि कांग्रेस को ऐसी रणनीति चाहिए जिसमें वह अपने मुस्लिम, दलित, ब्राह्मण और भूमिहार वोट बैंक को फिर से अपने पक्ष में खड़ा कर सके।
रिपोर्ट
अमित कुमार
