शंकराचार्य पद को लेकर जारी विवाद के बीच अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने एक बार फिर बड़ा बयान दिया है उन्होंने शंकराचार्य होने का पूरा प्रमाण सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत कर दिया है, इसके बावजूद उन्हें जानबूझकर विवादों में घसीटा जा रहा है अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि सरकार सुनियोजित तरीके से गो-भक्तों के खिलाफ घेराबंदी कर रही है और इस पूरी प्रक्रिया में कुछ बड़े धर्माचार्य भी परोक्ष रूप से शामिल हैंमीडिया से बातचीत में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि शंकराचार्य पद कोई राजनीतिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा और शास्त्रीय विधियों से तय होता है वे सभी आवश्यक शास्त्रीय मानकों पर खरे उतरते हैं और इस संबंध में प्रमाण भी दे चुके हैं इसके बावजूद बार-बार उनके शंकराचार्य होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जो दुर्भावनापूर्ण मानसिकता को दर्शाता हैउन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा समय में गो-संरक्षण और गो-भक्ति की बात करने वालों को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। अविमुक्तेश्वरानंद के अनुसार, सरकार की नीतियां और प्रशासनिक रवैया गो-भक्तों के खिलाफ है, जिससे सनातन परंपरा को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है उन्होंने कहा कि गो-रक्षा का मुद्दा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकार से भी जुड़ा हुआ है।अपने बयान में उन्होंने जगद्गुरु रामभद्राचार्य का भी उल्लेख किया अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि उन्हें इस बात का दुख है कि कुछ वरिष्ठ धर्माचार्य भी इस पूरे विवाद में सरकार के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि विचारधारा और नीति का विरोध कर रहे हैं अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सवाल उठाया कि यदि उन्होंने शंकराचार्य होने के प्रमाण प्रस्तुत कर दिए हैं, तो फिर बार-बार विवाद क्यों खड़ा किया जा रहा है उन्होंने इसे सनातन धर्म के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप बताया उनका कहना है कि धर्म के मामलों में राजनीति का दखल बढ़ना समाज के लिए घातक साबित हो सकता है इस पूरे मामले ने धार्मिक और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर जहां अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थक उनके दावों को सही ठहरा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके विरोधी इसे धार्मिक प्रतिष्ठानों में वर्चस्व की लड़ाई बता रहे हैं सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैंविशेषज्ञों का मानना है कि शंकराचार्य पद से जुड़ा विवाद केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा, धार्मिक स्वायत्तता और सत्ता के रिश्ते से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा करता है यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब गो-संरक्षण और धार्मिक अधिकारों को लेकर पहले से ही माहौल संवेदनशील बना हुआ हैफिलहाल, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने रुख पर अडिग हैं और उनका कहना है कि वे सत्य और शास्त्र के मार्ग से पीछे हटने वाले नहीं हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कितने ही विरोधों का सामना क्यों न करना पड़े
