जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर राजनीतिक नारेबाजी को लेकर चर्चा में आ गया है विश्वविद्यालय परिसर में कुछ छात्र समूहों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारे लगाए जाने का मामला सामने आया है बताया जा रहा है कि इस प्रदर्शन के दौरान कब्र खुदेगी जैसे आपत्तिजनक और भड़काऊ नारे भी लगाए गए, जिसके बाद कैंपस का माहौल तनावपूर्ण हो गयाप्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यह नारेबाजी एक छात्र संगठन की ओर से आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई प्रदर्शन में केंद्र सरकार की नीतियों, हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और कुछ प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ नाराजगी जताई गई। हालांकि नारेबाजी के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर कई छात्रों और शिक्षकों ने आपत्ति जताई और इसे लोकतांत्रिक विरोध की मर्यादा के खिलाफ बताया इस घटना की जानकारी मिलते ही विश्वविद्यालय प्रशासन हरकत में आया JNU प्रशासन ने बयान जारी कर कहा कि कैंपस में किसी भी तरह की हिंसा, घृणास्पद या धमकी भरी भाषा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा

प्रशासन ने स्पष्ट किया कि पूरे मामले की जांच की जा रही है और वीडियो फुटेज व प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी इस नारेबाजी का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अराजकता है और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ इस तरह की भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती वहीं विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने मामले को लेकर संयम बरतने की अपील की और कहा कि जांच के बाद ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए छात्र संगठनों के बीच भी इस मुद्दे पर मतभेद नजर आए कुछ संगठनों ने इसे सरकार के खिलाफ असहमति जताने का अधिकार बताया, जबकि अन्य छात्र समूहों ने कहा कि विरोध प्रदर्शन में हिंसक या धमकी भरे नारे लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं और इससे विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचता है कानून विशेषज्ञों का कहना है कि विरोध प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार हैं,

लेकिन इन अधिकारों की भी सीमाएं हैं यदि नारे या बयान किसी व्यक्ति या समूह के खिलाफ हिंसा, नफरत या धमकी को बढ़ावा देते हैं, तो वे कानूनी दायरे में आ सकते हैं ऐसे मामलों में विश्वविद्यालय प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे निष्पक्ष जांच करेंफिलहाल कैंपस में अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की गई है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके प्रशासन ने छात्रों से शांति बनाए रखने और संवाद के रास्ते अपनी बात रखने की अपील की है वहीं यह मामला एक बार फिर कैंपस पॉलिटिक्स, अभिव्यक्ति की आज़ादी और जिम्मेदारी के बीच संतुलन को लेकर बहस छेड़ता नजर आ रहा है जांच के नतीजों पर सबकी निगाहें टिकी हैं, क्योंकि उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई और इस विवाद की दिशा तय होगी
