भारत में यूएपीए कानून के तहत तिहाड़ जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ता उमर खालिद को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने उमर खालिद के नाम एक पत्र लिखकर उनकी चिंता जताई है मेयर ममदानी ने अपने पत्र में कहा है कि वह खालिद की लंबी हिरासत और उनके स्वास्थ्य व अधिकारों को लेकर चिंतित हैं इस पत्र के सामने आने के बाद यह मामला एक बार फिर वैश्विक मंच पर सुर्खियों में आ गया हैमेयर ममदानी ने अपने पत्र में लिखा कि लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले समाज में असहमति की आवाज़ को सुना जाना चाहिए और कानून के तहत निष्पक्ष सुनवाई हर नागरिक का अधिकार है वह उम्मीद करते हैं कि उमर खालिद को जल्द न्याय मिलेगा और कानूनी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ेगी इस पत्र में किसी तरह का हस्तक्षेप करने की बात नहीं कही गई है, लेकिन मानवीय आधार पर चिंता जरूर जताई गई है

उमर खालिद का मामला केवल न्यूयॉर्क के मेयर तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि अमेरिका के आठ सांसदों ने भी एक साझा बयान जारी कर भारत सरकार से अपील की है कि ताकि उमर खालिद को जमानत दी जाए लेकिन सांसदों का कहना है कि लंबे समय तक विचाराधीन कैद में रखना मानवाधिकारों के सिद्धांतों के खिलाफ है किसी भी लोकतांत्रिक देश में असहमति और आलोचना को अपराध नहीं माना जाना चाहिए उमर खालिद दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में पिछले काफी समय से तिहाड़ जेल में बंद हैं उनके खिलाफ मामला कमजोर है और उन्हें केवल उनके विचारों और भाषणों के कारण निशाना बनाया जा रहा है वहीं, सरकार और जांच एजेंसियों का तर्क है कि मामले की जांच अभी जारी है और कानून के अनुसार ही कार्रवाई की जा रही है इस पूरे घटनाक्रम पर भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं इससे पहले भी जब अंतरराष्ट्रीय संगठनों या विदेशी नेताओं ने भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की है,

तो सरकार ने इसे देश की संप्रभुता से जोड़ते हुए खारिज किया है माना जा रहा है कि इस बार भी सरकार का रुख यही रह सकता है कि यह भारत का आंतरिक और कानूनी मामला हैहालांकि, न्यूयॉर्क के मेयर का पत्र और अमेरिकी सांसदों की अपील यह दिखाती है कि उमर खालिद का मामला अब केवल देश तक सीमित नहीं रहा है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में इस पर नजर रखी जा रही है अब आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस अंतरराष्ट्रीय दबाव का कानूनी प्रक्रिया पर कोई असर पड़ता है या नहीं
