बिहार में विधानसभा उपचुनावों और हालिया राजनीतिक झटकों के बाद कांग्रेस अब बड़े संगठनात्मक बदलाव की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस जल्द ही राज्य में महागठबंधन से किनारा करने का ऐलान कर सकती है। माना जा रहा है कि यह फैसला नए साल की शुरुआत में आधिकारिक रूप से सामने आ सकता है।
शीर्ष नेताओं की चर्चा में लिया फैसला:-

दिल्ली में हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में पार्टी की शीर्ष नेतृत्व—राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल—ने बिहार कांग्रेस के नेताओं के साथ लंबी चर्चा की। इस बैठक में पराजित उम्मीदवारों से भी अलग-अलग मुलाकात कर हार के कारणों का विश्लेषण किया गया। सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने साफ संकेत दिए हैं कि अब कांग्रेस बिहार में अपने दम पर संगठन खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ेगी।
अपने पुराने कोर वोटर को मजबूत करने प्लान:-
बैठक में एक बड़े नेता ने बताया कि पार्टी अब नई जातीय राजनीति की बजाय अपने पारंपरिक समर्थन वर्ग पर भरोसा करेगी। पिछले कुछ सालों में कांग्रेस ने नीतीश कुमार के EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) वोट बैंक को आकर्षित करने की कोशिश की थी, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे। अब रणनीति यह है कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक समीकरण—मुस्लिम, दलित, ब्राह्मण और भूमिहार—पर दोबारा फोकस करेगी। यही वह समूह है जिसने कभी बिहार में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया था।
राज्य की जातीय जनगणना के अनुसार, मुस्लिमों की हिस्सेदारी करीब 18%, दलितों की लगभग 20%, ब्राह्मणों की 3.6% और भूमिहारों की करीब 2.8% है। यानी कांग्रेस का नया लक्षित वोट बैंक लगभग 44% आबादी को कवर करता है। संगठन में फेरबदल के जरिए इसी दिशा में कदम बढ़ाने की तैयारी है।
पूर्णिया सांसद पप्पू यादव से दूरी बना सकती है शीर्ष के नेता:-
इधर, पप्पू यादव के साथ कांग्रेस का रिश्ता भी एक नई करवट ले सकता है। लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों के बीच राजनीतिक नजदीकी देखने को मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में यह साझेदारी कांग्रेस को भारी पड़ी। पूर्णिया क्षेत्र, जो पप्पू यादव का गढ़ माना जाता है, वहां कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। छह विधानसभा सीटों में से एक भी सीट गठबंधन के खाते में नहीं गई।

जानकारी के मुताबिक, समीक्षा बैठक में राहुल गांधी ने पप्पू यादव से मिलने से भी परहेज किया, जिससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी अब उनसे दूरी बनाने के मूड में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में कांग्रेस की यह रणनीति राज्य की पारंपरिक राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। जहां एक ओर RJD और JDU OBC और EBC वर्ग पर केंद्रित हैं, वहीं कांग्रेस अब अपनी जड़ों की ओर लौटने की कोशिश कर रही है।
अगर यह योजना सफल रही, तो बिहार की सियासत में कांग्रेस एक बार फिर निर्णायक भूमिका में लौट सकती है। लेकिन फिलहाल, पार्टी को अपने संगठन और नेतृत्व के बीच भरोसा मजबूत करने की सबसे बड़ी चुनौती का सामना है।
रिपोर्ट
अंकित शेखावत
