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बांग्लादेश की सत्ता कहानी: हीरो शेख मुजीब कैसे बने तानाशाह,सेना और हत्या की साज़िश

Posted on फ़रवरी 9, 2026फ़रवरी 9, 2026 By realtodaynews94@gmail.com कोई टिप्पणी नहीं बांग्लादेश की सत्ता कहानी: हीरो शेख मुजीब कैसे बने तानाशाह,सेना और हत्या की साज़िश में

बांग्लादेश के इतिहास में शेख मुजीबुर रहमान को आज़ादी का नायक माना जाता है। 1971 के मुक्ति संग्राम में उनके नेतृत्व ने पाकिस्तान से अलग होकर एक नए राष्ट्र को जन्म दिया। लेकिन सत्ता मिलने के कुछ ही वर्षों में वही शेख मुजीब एक ऐसे शासक के रूप में उभरे, जिन पर लोकतंत्र को कमजोर करने और तानाशाही थोपने के आरोप लगे। यही सत्ता का केंद्रीकरण अंततः उनकी हत्या का कारण बना1971 में स्वतंत्रता के बाद शेख मुजीब बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री बने। देश युद्ध से तबाह था, अर्थव्यवस्था चरमराई हुई थी और प्रशासनिक ढांचा बेहद कमजोर था। इन हालात में मुजीब ने तेज़ी से फैसले लेने शुरू किए। शुरुआत में जनता ने उन्हें राष्ट्रनिर्माता के रूप में देखा, लेकिन जल्द ही सत्ता पर उनकी पकड़ मज़बूत होती चली गई।लोकतंत्र से हटकर एकदलीय शासन1975 में शेख मुजीब ने संविधान में संशोधन कर बहुदलीय व्यवस्था को खत्म किया और ‘बाक्साल’ (BAKSAL) नाम से एकदलीय शासन लागू किया। प्रेस की आज़ादी सीमित कर दी गई, विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ बढ़ीं और असहमति को राष्ट्रविरोधी करार दिया जाने लगा। यही वह मोड़ था

जब शेख मुजीब की छवि एक लोकतांत्रिक नेता से तानाशाह जैसी होने लगी।सेना को दी ताकत, बढ़ा असंतोषसत्ता को सुरक्षित रखने के लिए शेख मुजीब ने सेना और सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार दिए। ‘रक्षा वाहिनी’ जैसी ताकतवर फोर्स बनाई गई, जिसे सीधे सत्ता का संरक्षण मिला। लेकिन इससे सेना के भीतर ही असंतोष पनपने लगा। कई सैन्य अधिकारी खुद को हाशिए पर महसूस करने लगे और सरकार से टकराव बढ़ता गयाआर्थिक संकट और जनता की नाराज़गी1974 का अकाल शेख मुजीब सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हुआ। लाखों लोगों की मौत हुई, महंगाई बढ़ी और भ्रष्टाचार के आरोप खुले तौर पर लगने लगे। जनता में यह भावना बनने लगी कि जिस नेता ने आज़ादी दिलाई, वही अब आम लोगों की पीड़ा नहीं समझ पा रहा हैखूनी अंत15 अगस्त 1975 को तख्तापलट के दौरान शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई।

यह विडंबना ही थी कि जिस सेना को सत्ता मजबूत करने के लिए उन्होंने ताकत दी थी, उसी के कुछ अधिकारियों ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया। इस घटना ने बांग्लादेश की राजनीति को दशकों तक अस्थिर कर दिया शेख मुजीब की हत्या के बाद बांग्लादेश में सैन्य शासन का दौर शुरू हुआ। लोकतंत्र लंबे समय तक कमजोर रहा। आज भी बांग्लादेश की राजनीति शेख मुजीब की विरासत के इर्द-गिर्द घूमती है। एक ओर उन्हें राष्ट्रपिता कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर उनके शासन को तानाशाही के उदाहरण के रूप में भी देखा जाता हैबांग्लादेश के मौजूदा चुनावी माहौल में शेख मुजीब का यह इतिहास एक बार फिर चर्चा में है। सत्ता, सेना और लोकतंत्र के बीच संतुलन का सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1975 में था

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