देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए जवान को अंतिम विदाई के दौरान जो दृश्य सामने आया, उसने हर आंख नम कर दी शहीद की पत्नी अपने पति के पार्थिव शरीर के पास बैठकर बार-बार यही कहती रही आंखें मूंदकर सोए हो, अब मैं बच्चों को कैसे पालूंगी यह दृश्य केवल एक परिवार के टूटने का नहीं, बल्कि उस दर्द का प्रतीक था, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल हैशहीद की पत्नी ने अधिकारियों और मौजूद लोग के सामने अपना दर्द खुलकर रखा उन्होंने कहा कि पति के जाने के बाद उनका परिवार जैसे लावारिस हो गया है रोते-बिलखते हुए उन्होंने अफसरों से कहा हमने देश को अपना सब कुछ दे दिया, लेकिन अब लगता है कि हमें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है

उनका यह बयान वहां मौजूद हर व्यक्ति के दिल को झकझोर गया।सबसे मार्मिक पल तब आया, जब शहीद के 11 साल के बेटे को पिता को मुखाग्नि देने की तैयारी करनी पड़ी। इतनी छोटी उम्र में पिता को खोने का दुख और अंतिम संस्कार का भार—यह दृश्य हर किसी को अंदर तक तोड़ देने वाला था बेटे ने कांपते हाथों से पिता को अंतिम विदाई दी, जबकि मां बेसुध होकर बार-बार अपने पति का नाम पुकारती रहीपरिवार के अनुसार, शहीद ही घर के एकमात्र कमाने वाले थे। उनके जाने के बाद पत्नी के सामने बच्चों की परवरिश, पढ़ाई और भविष्य को लेकर गहरी चिंता खड़ी हो गई है पत्नी का कहना है कि वह अपने बच्चों को आत्मसम्मान के साथ बड़ा करना चाहती हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें सरकारी सहायता और भरोसे की जरूरत हैशहीद की पत्नी ने प्रशासन पर भी सवाल उठाए उन्होंने कहा कि आश्वासन तो बहुत दिए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर मदद कब और कैसे मिलेगी,

इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता उन्होंने मांग की कि शहीद परिवारों के लिए घोषित योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि समय पर उनका लाभ दिया जाएइस दौरान स्थानीय प्रशासन और सैन्य अधिकारियों ने परिवार को हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया अधिकारियों ने कहा कि शहीद परिवार को नियमानुसार मुआवजा, पेंशन और अन्य सुविधाएं दी जाएंगी। हालांकि, पत्नी का कहना है कि इस कठिन समय में केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि तत्काल सहयोग से ही परिवार को संभाला जा सकता हैगांव और आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग शहीद को अंतिम विदाई देने पहुंचे हर किसी की जुबान पर यही बात थी कि देश के लिए जान देने वाले जवान और उसके परिवार के साथ कोई अन्याय नहीं होना चाहिए

लोगों ने प्रशासन से मांग की कि शहीद के परिवार को स्थायी सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का भरोसा दिया जाएयह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों के परिवारों की जिम्मेदारी सिर्फ भावनात्मक श्रद्धांजलि तक ही सीमित क्यों रह जाती है शहीद की पत्नी की आंखों से बहते आंसू और बेटे के कांपते हाथ पूरे सिस्टम के लिए एक कठोर सवाल हैं क्या बलिदान की कीमत समय पर चुकाई जा रही है
