माघ मेला प्राधिकरण और ज्योतिषपीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच चल रहे विवाद ने नया मोड़ ले लिया है मेला प्राधिकरण द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अंग्रेजी भाषा में चिट्ठी लिखकर अपना जवाब भेजा है। इस पत्र में उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है— हां, मैं शंकराचार्य हूं और अपनी पहचान पर उठाए गए सवालों को अनुचित बताया हैदरअसल, माघ मेला क्षेत्र में तीन दिनों से धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मेला प्राधिकरण की ओर से नोटिस जारी किया गया था नोटिस में उनसे 24 घंटे के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा गया था कि वह किस आधार पर खुद को शंकराचार्य बता रहे हैं इस नोटिस के बाद धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस शुरू हो गई थीअब इस नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेला प्राधिकरण को एक औपचारिक पत्र भेजा है, जो अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है अपने पत्र में उन्होंने कहा कि शंकराचार्य पद कोई प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि सनातन परंपरा से जुड़ा आध्यात्मिक पद है,

जिसकी वैधता का निर्धारण किसी सरकारी संस्था द्वारा नहीं किया जा सकता। उन्होंने लिखा कि शंकराचार्य की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है और इसका निर्धारण शास्त्रों, मठ परंपराओं और धर्माचार्यों द्वारा होता हैस्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि उनकी नियुक्ति विधिवत परंपराओं और शास्त्रीय प्रक्रियाओं के तहत हुई है किसी भी प्रशासनिक निकाय को उनकी धार्मिक पहचान पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है पत्र में उन्होंने मेला प्राधिकरण से आग्रह किया कि वह धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करेउन्होंने यह भी कहा कि वह माघ मेले में किसी अवैध गतिविधि के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हैं उनका कहना है कि सनातन धर्म, गौ संरक्षण और सामाजिक मूल्यों से जुड़े विषयों पर सरकार और समाज का ध्यान आकर्षित करना उनका उद्देश्य हैइस पूरे मामले पर माघ मेला प्राधिकरण की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है,

लेकिन सूत्रों के मुताबिक प्राधिकरण स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के जवाबी पत्र का अध्ययन कर रहा है प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर विचार-विमर्श जारी हैउधर, इस विवाद के सामने आने के बाद संत समाज भी दो हिस्सों में बंटा नजर आ रहा है कुछ संतों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि शंकराचार्य पद की गरिमा पर सवाल उठाना अनुचित है। वहीं, कुछ अन्य संतों का मानना है कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता जरूरी हैराजनीतिक गलियारों में भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है विपक्षी दलों ने प्रशासन पर धार्मिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाया है,

जबकि सत्तापक्ष की ओर से कहा गया है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी हैकुल मिलाकर, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की अंग्रेजी चिट्ठी के बाद यह मामला और गहराता नजर आ रहा है अब सबकी नजर माघ मेला प्राधिकरण के अगले कदम पर टिकी है आने वाले दिनों में यह विवाद धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ी बहस का रूप ले सकता है
