कोपेनहेगन ,ब्रसेल्स :- ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच एक बार फिर तीखा राजनीतिक टकराव सामने आया है डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का हमला हुआ तो इसका मतलब NATO के अस्तित्व पर सीधा प्रहार होगा उनके इस बयान के बाद यूरोप की राजनीति में हलचल मच गई है और 7 यूरोपीय देश खुलकर डेनमार्क के समर्थन में आ गए हैं, जिन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और रुख का विरोध किया हैडेनमार्क की प्रधानमंत्री ने कहा कि ग्रीनलैंड कोई व्यापारिक सौदा या रणनीतिक जमीन नहीं है, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की मातृभूमि है ग्रीनलैंड का भविष्य वहां के लोग खुद तय करेंगे किसी बाहरी ताकत को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं है पीएम ने यह भी जोड़ा कि ग्रीनलैंड पर हमला सिर्फ डेनमार्क पर नहीं, बल्कि पूरे यूरोप और NATO गठबंधन पर हमला माना जाएगा दरअसल, ग्रीनलैंड को लेकर विवाद उस समय तेज हुआ था जब डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान इसे अमेरिका द्वारा खरीदने” की बात कही थी इसके बाद समय-समय पर अमेरिका की ओर से ऐसे संकेत भी दिए गए, जिनसे यह संदेश गया कि वॉशिंगटन ग्रीनलैंड को रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम मानता है आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, खनिज संसाधन और सैन्य महत्व के चलते ग्रीनलैंड वैश्विक ताकतों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।

डेनमार्क की पीएम के बयान के बाद फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, नीदरलैंड्स, नॉर्वे और स्वीडन जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने भी एकजुट होकर समर्थन जताया है इन देशों ने साझा बयान में कहा कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता और वहां के लोगों के अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है किसी भी तरह का सैन्य दबाव या धमकी अंतरराष्ट्रीय कानून और NATO की मूल भावना के खिलाफ है यूरोपीय नेताओं का कहना है कि NATO एक रक्षा गठबंधन है, न कि किसी सदस्य देश के खिलाफ इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार ,अगर NATO का कोई सदस्य या सहयोगी देश ही दूसरे सदस्य की जमीन पर हमला करने की बात करेगा, तो यह गठबंधन की नींव को हिला देगा उनके मुताबिक, ऐसा हुआ तो NATO का अस्तित्व ही सवालों के घेरे में आ जाएगा ग्रीनलैंड, जो भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका के नजदीक है,

राजनीतिक रूप से डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है यहां की अपनी संसद और सरकार है, लेकिन विदेश नीति और रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है हाल के वर्षों में ग्रीनलैंड के भीतर भी स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय को लेकर बहस तेज हुई है, लेकिन वहां के नेताओं ने बार-बार कहा है कि कोई भी फैसला लोकतांत्रिक तरीके से और जनता की इच्छा से ही लिया जाएगा यह विवाद सिर्फ ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं है,

बल्कि यह अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में बढ़ते तनाव को भी दर्शाता है खासकर ट्रंप के दौर में अमेरिका फर्स्ट नीति के चलते कई बार NATO और यूरोपीय सहयोगियों के साथ टकराव देखने को मिला ग्रीनलैंड मुद्दा उसी मानसिकता की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है फिलहाल, डेनमार्क और यूरोपीय देशों की एकजुटता ने यह साफ कर दिया है कि ग्रीनलैंड को लेकर कोई भी आक्रामक कदम आसान नहीं होगा यह मामला आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और गरमा सकता है, क्योंकि इसमें न सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि NATO की एकता और विश्व व्यवस्था का सवाल भी जुड़ा हुआ है
