
देश में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। आंगनबाड़ी सेविका प्रेमलता हेंब्रम बीमार थीं, चलने की हालत में नहीं थीं। लेकिन सिस्टम को उनकी बीमारी पर यकीन नहीं हुआ। मजबूर होकर उनके पति को उन्हें उसी हालत में ऑफिस तक लाना पड़ा। और दूसरी तस्वीर जीतू मुंडा।

अपनी ही बहन के खाते से पैसे निकालने के लिए, उसे उसकी मौत के बाद भी चैन नहीं मिला। बैंक ने पहचान के लिए कहा, सबूत चाहिए तो वो उसकी लाश लेकर दरवाजे तक पहुंच गया। ये घटनाएं सिर्फ दर्दनाक नहीं, बल्कि सरकार और सिस्टम की संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल हैं। क्या योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं क्या आदिवासियों की आवाज़ आज भी अनसुनी है क्या ये वही “नया भारत” है जिसकी बात होती है?
