छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति और पुनर्वास की दिशा में एक अहम पहल के तहत “पांडुम कैफे” की शुरुआत की गई है। इस कैफे की सबसे खास बात यह है कि इसे आत्मसमर्पण कर चुके नक्सली और नक्सल हिंसा के पीड़ित परिवारों के सदस्य मिलकर चला रहे हैं। मुख्यमंत्री विश्णु देव साय ने मंगलवार को कैफे का उद्घाटन किया गया और पहले दिन यहीं से भोजन का ऑर्डर देकर कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाया गया है सरेंडर किए नक्सलियों को कैफे शुरू करने से पहले हॉस्पिटैलिटी, खाना बनाने, सर्व करने और ग्राहक सेवा की प्रोफेशनल ट्रेनिंग दी गई हैउन्हें साफ-सफाई, भोजन सुरक्षा, मैनेजमेंट और उद्यमिता की भी विशेष शिक्षा दी गई है, ताकि वे समाज में आत्मविश्वास के साथ दोबारा जुड़ सकेंकई पूर्व माओवादी कर्मचारियों ने कहा कि बंदूक छोड़कर अब कॉफी परोसना उनके लिए “नई जिंदगी” जैसा है।कई परिवार जिन्होंने नक्सल हिंसा झेली है, वे भी इसी टीम का हिस्सा हैं—इससे समुदाय में समन्वय और भरोसा बढ़ाने में मदद मिलेगी कैफे का नाम स्थानीय गोंडी भाषा से लिया गया है।इसकी टैगलाइन — “Where every cup tells a story” — यह दर्शाती है कि यहां परोसे जाने वाला हर कप संघर्ष से बदलाव की कहानी कहता है यह पहल छत्तीसगढ़ सरकार की सरेण्डर और पुनर्वास नीति के अंतर्गत शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य हथियार छोड़ चुके लोगों को सम्मान स्थायी आजीविकाऔर समाज में पुनः स्वीकार्यता दिलाना है।पांडुम कैफे न केवल सरेंडर किए नक्सलियों के लिए रोज़गार का साधन बना है, बल्कि यह बस्तर में विकास, शांति और पुनर्स्थापन का प्रतीक बन रहा है।अधिकारियों का मानना है कि यह मॉडल आगे चलकर अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है।
