नई दिल्ली ,भारत की न्यायिक प्रणाली वर्तमान में गंभीर चुनौती का सामना कर रही है हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, देशभर में कुल 5.50 करोड़ मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं इसमें सुप्रीम कोर्ट में करीब 90 हजार और हाई कोर्टों में लगभग 63 लाख मामले शामिल हैं यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि न्याय पाने के लिए आम नागरिकों को सालों तक इंतजार करना पड़ सकता है देश की अदालतों में लगातार इस मामलों की संख्या बढ़ रही है, और इससे न्यायिक प्रणाली पर भारी दबाव बढ़ गया है सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के अलावा, जिला और सत्र अदालतों में भी लाखों मामले फैसले का इंतजार कर रहे हैं लंबित मामलों की इस बड़ी संख्या ने न केवल न्याय की प्रक्रिया को धीमा कर दिया है,

बल्कि आम लोगों का न्याय पर विश्वास भी कमजोर कर दिया है देश में लंबित मामलों की संख्या बढ़ने की मुख्य वजहें जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और अदालतों में न्यायाधीशों की कमी हैं सुप्रीम कोर्ट में करीब 90 हजार मामले लंबित हैं, जिनमें संवैधानिक, आर्थिक, व्यावसायिक और सामाजिक मामलों की बड़ी संख्या शामिल है वहीं, हाई कोर्टों में लगभग 63 लाख इस मामले के फैसले का इंतजार कर रहे हैं जिला अदालतों और सत्र अदालतों में भी मामलों की संख्या लाखों में है यह पेंडेंसी केवल संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति, मामलों के लंबित रहने के कारण समय और संसाधनों की बर्बादी, और आम जनता की न्याय तक पहुँच को प्रभावित करती है इस लंबित मामलों से सबसे ज्यादा प्रभावित आम जनता है, जो न्याय पाने के लिए वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटती रहती है इसके अलावा, वकील और न्यायाधीश भी लगातार बढ़ते काम के दबाव में हैं सरकार और नीति निर्धारक भी चिंतित हैं, क्योंकि न्यायिक प्रणाली पर लोगों का विश्वास कमजोर हो रहा है लंबित मामलों की संख्या बढ़ने से व्यवसाय, निवेश और सामाजिक मामलों में भी असर पड़ता है जैसे कि संपत्ति विवाद, भूमि विवाद, आर्थिक विवाद और उपभोक्ता मामलों में लंबित मामलों के कारण लोगों को न्याय मिलने में लंबा समय लगता है इससे सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है यह आंकड़ा वर्तमान वित्तीय वर्ष में सामने आया है देशभर की सभी अदालतें, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला अदालतें, इस लंबित मामलों के बोझ तले दब रही हैं उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और जिला अदालतों में भी यही स्थिति है।

भारत में न्यायिक प्रणाली पर दबाव लंबे समय से बढ़ रहा है, और हाल के वर्षों में मामले और तेजी से बढ़ते दिख रहे है इस लंबित मामलों की संख्या बढ़ने के कई कारण हैं
1. न्यायाधीशों की कमी:-अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त नहीं है, जिससे सुनवाई धीमी हो जाती है
2. बढ़ती मामलों की संख्या:-देश में हर साल लाखों नए मामले दर्ज होते हैं, जिनसे पेंडेंसी बढ़ती है
3. जटिल कानूनी प्रक्रियाएं:- कानूनी नियम और प्रक्रियाएं जटिल होने के कारण मामले लंबित रहते हैं
4. संसाधनों का अभाव:- अदालतों में पर्याप्त स्टाफ और तकनीकी सुविधाओं की कमी भी मामलों की धीमी निपटान प्रक्रिया का कारण हैइन समस्याओं का समाधान केवल तकनीकी उपायों से नहीं किया जा सकता इसके लिए प्रशासनिक और संस्थागत सुधार आवश्यक हैंअदालतें मामलों की लंबित सूची को कम करने के लिए कई उपाय कर रही हैं इनमें शामिल हैं

ऑनलाइन पंजीकरण और वर्चुअल सुनवाई ई-कोर्ट प्रणाली ने मामलों की सुनवाई को तेज करने में मदद की है ,समयबद्ध सुनवाई योजना:- लंबित मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देने के लिए योजना बनाई गई है इसके बावजूद, व लंबित मामलों की संख्या कम करने के लिए अदालतों की संख्या बढ़ाना, नए न्यायाधीशों की नियुक्ति तेज करना और विशेष सुनवाई बेंचों का विस्तार करना जरूरी है ,कानून केवल डिजिटल और तकनीकी सुधार पर्याप्त नहीं हैं बल्कि लंबित मामलों की संख्या घटाने के लिए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना, अदालतों की संख्या बढ़ाना और विशेष मामलों के लिए त्वरित सुनवाई बेंच बनाना जरूरी है आम जनता को न्याय दिलाने के लिए प्रशासनिक सुधार, कानूनी प्रक्रियाओं में सुधार और मामलों की प्राथमिकता तय करने की नीति लागू करनी होगी इसके बिना, न्याय की प्रक्रिया धीमी रहेगी और लंबित मामलों की संख्या और ज्यादा बढ़ सकती है
